Tuesday, 22 August 2017

हरिशंकर परसाई

आज है 22 अगस्त यानि की हरिशंकर परसाई जी का जन्मदिन | परसाई जी ने मात्र व्यंग्य को विधा के रूप में ही पहचान नहीं दिलाई बल्कि असल में एक सम्पूर्ण 'व्यंग्य' क्या होता है उससे हमे परिचित कराया | परसाई जी का लगभग पूरा साहित्य चाहे वह कविता हो, कहानी हो, निबन्ध हो, उपन्यास हो या व्यंग्य विधा हो सब में समाज की विसंगतियों पर प्रहार करता दिखाई देता है | सामाजिक, आर्थिक, राजनितिक व्यवस्थाओं में जकड़े आम जन-मानस के यथार्थ को बहुत ही गम्भीरता से परसाई जी अलग-अलग विधा में अपनी बात कहते है | परसाई जी की हास्य से भरी बातें भी ह्रदय में एक गम्भीर प्रहार करती है और हमे सोचने पर मजबूर करती है | 
इस अवसर पर पढ़ते है 'हास्य व्यंग'- 'भारत को चाहिए जादूगर और साधु' और कूड़ा-करकट टीम की और से परसाई जी और इनके साहित्य को सलाम जिसकी वजह से इनको आज भी याद किया और पढ़ा जाता है | 


'भारत को चाहिए जादूगर और साधु' 


हर 15 अगस्त और 26 जनवरी को मैं सोचता हूँ कि साल-भर में कितने बढ़े। न सोचूँ तो भी काम चलेगा - बल्कि ज्यादा आराम से चलेगा। सोचना एक रोग है, जो इस रोग से मुक्त हैं और स्वस्थ हैं, वे धन्य हैं।
यह 26 जनवरी 1972 फिर आ गया। यह गणतंत्र दिवस है, मगर 'गण' टूट रहे हैं। हर गणतंत्र दिवस 'गण' के टूटने या नए 'गण' बनने के आंदोलन के साथ आता है। इस बार आंध्र और तेलंगाना हैं। अगले साल इसी पावन दिवस पर कोई और 'गण' संकट आएगा।
इस पूरे साल में मैंने दो चीजें देखीं। दो तरह के लोग बढ़े - जादूगर और साधु बढ़े। मेरा अंदाज था, सामान्य आदमी के जीवन के सुभीते बढ़ेंगे - मगर नहीं। बढ़े तो जादूगर और साधु-योगी। कभी-कभी सोचता हूँ कि क्या ये जादूगर और साधु 'गरीबी हटाओ' प्रोग्राम के अंतर्गत ही आ रहे हैं! क्या इसमें कोई योजना है?

रोज अखबार उठाकर देखता हूँ। दो खबरें सामने आती हैं - कोई नया जादूगर और कोई नया साधु पैदा हो गया है। उसका विज्ञापन छपता है। जादूगर आँखों पर पट्टी बाँधकर स्कूटर चलाता है और 'गरीबी हटाओ' वाली जनता कामधाम छोड़कर, तीन-चार घंटे आँखों पर पट्टी बाँधे जादू्गर को देखती हजारों की संख्या में सड़क के दोनों तरफ खड़ी रहती है। ये छोटे जादूगर हैं। इस देश में बड़े बड़े जादूगर हैं, जो छब्बीस सालों से आँखों पर पट्टी बाँधे हैं। जब वे देखते हैं कि जनता अकुला रही है और कुछ करने पर उतारू है, तो वे फौरन जादू का खेल दिखाने लगते हैं। जनता देखती है, ताली पीटती है। मैं पूछता हूँ - जादूगर साहब, आँखों पर पट्टी बाँधे राजनैतिक स्कूटर पर किधर जा रहे हो? किस दिशा को जा रहे हो - समाजवाद? खुशहाली? गरीबी हटाओ? कौन सा गंतव्य है? वे कहते हैं - गंतव्य से क्या मतलब? जनता आँखों पर पट्टी बाँधे जादूगर का खेल देखना चाहती है। हम दिखा रहे हैं। जनता को और क्या चाहिए?

जनता को सचमुच कुछ नहीं चाहिए। उसे जादू के खेल चाहिए। मुझे लगता है, ये दो छोटे-छोटे जादूगर रोज खेल दिखा रहे हैं, इन्होंने प्रेरणा इस देश के राजनेताओं से ग्रहण की होगी। जो छब्बीस सालों से जनता को जादू के खेल दिखाकर खुश रखे हैं, उन्हें तीन-चार घंटे खुश रखना क्या कठिन है। इसलिए अखबार में रोज फोटो देखता हूँ, किसी शहर में नए विकसित किसी जादूगर की।

सोचता हूँ, जिस देश में एकदम से इतने जादूगर पैदा हो जाएँ, उस जनता की अंदरूनी हालत क्या है? वह क्यों जादू से इतनी प्रभावित है? वह क्यों चमत्कार पर इतनी मुग्ध है? वह जो राशन की दुकान पर लाइन लगाती है और राशन नहीं मिलता, वह लाइन छोड़कर जादू के खेल देखने क्यों खड़ी रहती है?
मुझे लगता है, छब्बीस सालों में देश की जनता की मानसिकता ऐसी बना दी गई है कि जादू देखो और ताली पीटो। चमत्कार देखो और खुश रहो।

बाकी काम हम पर छोड़ो।

भारत-पाक युद्ध ऐसा ही एक जादू था। जरा बड़े स्केल का जादू था, पर था जादू ही। जनता अभी तक ताली पीट रही है।
उधर राशन की दुकान पर लाइन बढ़ती जा रही है।
देशभक्त मुझे माफ करें। पर मेरा अंदाज है, जल्दी ही एक शिमला शिखर-वार्ता और होगी। भुट्टो कहेंगे - पाकिस्तान में मेरी हालत खस्ता। अलग-अलग राज्य बनना चाह रहे हैं। गरीबी बढ़ रही है। लोग भूखे मर रहे हैं।

हमारी प्रधानमंत्री कहेंगी - इधर भी गरीबी हट नहीं रही। कीमतें बढ़ती जा रही हैं। जनता में बड़ी बेचैनी है। बेकारी बढ़ती जा रही है।

तब दोनों तय करेंगे - क्यों न पंद्रह दिनों का एक और जादू हो जाए। चार-पाँच साल दोनों देशों की जनता इस जादू के असर में रहेगी। (देशभक्त माफ करें - मगर जरा सोंचें)

जब मैं इन शहरों के इन छोटे जादूगरों के करतब देखता हूँ तो कहता हूँ - बच्चों, तुमने बड़े जादू नहीं देखे। छोटे देखे हैं तो छोटे जादू ही सीखे हो।

दूसरा कमाल इस देश में साधु है। अगर जादू से नहीं मानते और राशन की दुकान पर लाइन लगातार बढ़ रही है, तो लो, साधु लो।

जैसे जादूगरों की बाढ़ आई है, वैसे ही साधुओं की बाढ़ आई है। इन दोनों में कोई संबंध जरूर है।

साधु कहता है - शरीर मिथ्या है। आत्मा को जगाओ। उसे विश्वात्मा से मिलाओ। अपने को भूलो। अपने सच्चे स्वरूप को पहचानो। तुम सत्-चित्-आनंद हो।

आनंद ही ब्रह्म है। राशन ब्रह्म नहीं। जिसने 'अन्नं ब्रह्म' कहा था, वह झूठा था। नौसिखिया था। अंत में वह इस निर्णय पर पहुँचा कि अन्न नहीं 'आनंद' ही ब्रह्म है।

पर भरे पेट और खाली पेट का आनंद क्या एक सा है? नहीं है तो ब्रह्म एक नहीं अनेक हुए। यह शास्त्रोक्त भी है - 'एको ब्रह्म बहुस्याम।' ब्रह्म एक है पर वह कई हो जाता है। एक ब्रह्म ठाठ से रहता है, दूसरा राशन की दुकान में लाइन से खड़ा रहता है, तीसरा रेलवे के पुल के नीचे सोता है।

सब ब्रह्म ही ब्रह्म है।

शक्कर में पानी डालकर जो उसे वजनदार बनाकर बेचता है, वह भी ब्रह्म है और जो उसे मजबूरी में खरीदता है, वह भी ब्रह्म है।

ब्रह्म, ब्रह्म को धोखा दे रहा है।

साधु का यही कर्म है कि मनुष्य को ब्रह्म की तरफ ले जाय और पैसे इकट्ठे करे; क्योंकि 'ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या।'

26 जनवरी आते आते मैं यही सोच रहा हूँ कि 'हटाओ गरीबी' के नारे को, हटाओ महँगाई को, हटाओ बेकारी को, हटाओ भुखमरी को, क्या हुआ?

बस, दो तरह के लोग बहुतायत से पैदा करें - जादूगर और साधु।

ये इस देश की जनता को कई शताब्दी तक प्रसन्न रखेंगे और ईश्वर के पास पहुँचा देंगे।

भारत-भाग्य विधाता। हममें वह क्षमता दे कि हम तरह-तरह के जादूगर और साधु इस देश में लगातार बढ़ाते जाएँ।

हमें इससे क्या मतलब कि 'तर्क की धारा सूखे मरूस्थल की रेत में न छिपे'(रवींद्रनाथ) वह तो छिप गई। इसलिए जन-गण-मन अधिनायक! बस हमें जादूगर और पेशेवर साधु चाहिए। तभी तुम्हारा यह सपना सच होगा कि हे परमपिता, उस स्वर्ग में मेरा यह देश जाग्रत हो। (जिसमें जादू्गर और साधु जनता को खुश रखें)।

यह हो रहा है, परमपिता की कृपा से!

Monday, 7 August 2017

●भीष्म साहनी- मानवीय संवेदना के सशक्त साहित्यकार●

आज है 8 अगस्त यानी बहु आयामी व्यक्तित्व से सराबोर,ज़िंदादिल, खुशमिज़ाज़ बहुमुखी प्रतिभा से ओत-प्रोत तथा मानवीय पहलुओं से सरोकार रखने वाले कहानीकार,नाटककार,उपन्यासकार,रंगकर्मी और अनुवादक भीष्म साहनी का जन्मदिवस। सबसे पहले कूड़ा-करकट ब्लॉग समूह की ओर से जन्मदिवस के इस सुअवसर पर भीष्म साहनी को नमन। जैसा की आप सभी इस बात से भली-भाँती परिचित हैं की कूड़ा-करकट ब्लॉग समूह साहित्य,कला और संस्कृति से सम्बंधित सभी प्रमुख व्यक्तियों के जन्मदिवस और पुण्यतिथि के अवसर पर उनको अपने तर स्मरण करता है और आप सभी के लिए उनसे सम्बंधित अर्थात उनके द्वारा रचित मुख्य सामग्री को आप सभी तक पहुँचाने का प्रयास करता है। तो आइए इस कड़ी में हमारे साथ और जन्मदिवस के इस अवसर पर आनंद लीजिए भीष्म साहनी द्वारा लिखित ' खून का रिश्ता 'नामक कहानी का और देखिए भीष्म साहनी से सम्बंधित कुछ चित्र जिनको संवारा है हमारे ही साथी आमिर विद्यार्थी ने-






 





   
खून का रिश्ता (भीष्म साहनी)




खाट की पाटी पर बैठा चाचा मंगलसेन हाथ में चिलम थामे सपने देख रहा था। उसने देखा कि वह समधियों के घर बैठा है और वीरजी की सगाई हो रही है। उसकी पगड़ी पर केसर के छींटे हैं और हाथ में दूध का गिलास है जिसे वह घूँट-घूँट करके पी रहा है। दूध पीते हुए कभी बादाम की गिरी मुँह में जाती है, कभी पिस्‍ते की। बाबूजी पास खड़े स‍मधियों से उसका परिचय करा रहे हैं, यह मेरा चचाजाद छोटा भाई है, मंगलसेन! समधी मंगलसेन के चारों ओर घूम रहे हैं। उनमें से एक झुककर बड़े आग्रह से पूछता है, और दूध लाऊँ, चाचाजी? थोड़ा-सा और? अच्‍छा, ले आओ, आधा गिलास, मंगलसेन कहता है और तर्जनी से गिलास के तल में से शक्‍कर निकाल-निकालकर चाटने लगता है...

मंगलसेन ने जीभ का चटखरा लिया और सिर हिलाया। तंबाकू की कड़वाहट से भरे मुँह में भी मिठास आ गई, मगर स्‍वप्‍न भंग हो गया। हल्‍की-सी झुरझुरी मंगलसेन के सारे बदन में दौड़ गई और मन सगाई पर जाने के लिए ललक उठा। यह स्‍वप्‍नों की बात नहीं थी, आज सचमुच भतीजे की सगाई का दिन था। बस, थोड़ी देर बाद ही सगे-संबंधी घर आने लगेंगे, बाजा बजेगा, फिर आगे-आगे बाबूजी, पीछे-पीछे मंगलसेन और घर के अन्‍य संबंधी, सभी सड़क पर चलते हुए, समधियों के घर जाएँगे।

मंगलसेन के लिए खाट पर बैठना असंभव हो गया। बदन में खून तो छटाँक-भर था, मगर ऐसा उछलने लगा था कि बैठने नहीं देता था।

ऐन उसी वक्त कोठरी में संतू आ पहुँचा और खाट पर बैठकर मंगलसेन के हाथ में से चिलम लेते हुए बोला, ''तुम्‍हें सगाई पर नहीं ले जाएँगे; चाचा।''

चाचा मंगलसेन के बदन में सिर से पाँव तक लरजिश हुई। पर यह सोचकर कि संतू खिलवाड़ कर रहा है, बोला, ''बड़ों के साथ मजाक नहीं किया करते, कई बार कहा है। मुझे नहीं ले जाएँगे, तो क्‍या तुम्‍हें ले जाएँगे?''

''किसी को भी नहीं ले जाएँगे, तो क्‍या तुम्‍हें ले जाएँगे?''

''किसी को भी नहीं ले जाएँगे। वीरजी कहते हैं, सगाई डलवाने सिर्फ बाबूजी जाएँगे, और कोई नहीं जाएगा।''

''वीरजी आए हैं?'' चाचा मंगलसेन के बदन में फिर लरजिश हुई और दिल धक्-धक् करने लगा। संतू घर का पुराना नौकर था, क्‍या मालूम ठीक ही कहता हो।

''ऊपर चलो, सब लोग खाना खा रहे हैं।'' संतू ने चिलम के दो कश लगाए, फिर चिलम को ताक पर रखा और बाहर जाने लगा। दरवाजे के पास पहुँचकर उसने फिर एक बार घूमकर हँसते हुए कहा, ''तुम्‍हें नहीं ले जाएँगे, चाचा, लगा लो शर्त, दो-दो रुपये की शर्त लगती है?''

''सब, बक-बक नहीं कर, जा अपना काम देख!''

ऊपर रसोईघर में सचमुच बहस चल रही थी। संतू ने गलत नहीं कहा था। रसोईघर में एक तरफ, दीवार के साथ पीठ लगाए बाबूजी बैठे खाना खा रहे थे। चौके के ऐन बीच में वीरजी और मनोरमा, भाई-बहन, एक साथ, एक ही थाली में खाना खा रहे थे। माँजी चूल्‍हे के सामने बैठी पराठे सेंक रही थीं। माँ बेटे को समझा रही थीं, ''यही मौके खुशी के होते हैं, बेटा! कोई पैसे का भूखा नहीं होता। अकेले तुम्‍हारे पिताजी सगाई डलवाने जाएँगे तो समधी भी इसे अपना अपमान समझेंगे।''

''मैंने कह दिया, माँ, मेरी सगाई सवा रुपये में होगी और केवल बाबूजी सगाई डलवाने जाएँगे। जो मंजूर नहीं हो तो अभी से...''

''बस-बस, आगे कुछ मत कहना!'' माँ ने झट टोकते हुए कहा। फिर क्षुब्‍ध होकर बोली, ''जो तुम्‍हारे मन में आए करो। आजकल कौन किसी की सुनता है! छोटा-सा परिवार और इसमें भी कभी कोई काम ढंग से नहीं हुआ। मुझे तो पहले ही मालूम था, तुम अपनी करोगे...''

''अपनी क्‍यों करेगा, मैं कान खींचकर इसे मनवा लूँगा।'' बाबूजी ने बेटे की ओर देखते हुए बड़े दुलार से कहा।

पर वीरजी खीज उठे, ''क्‍या आप खुद नहीं कहा करते थे कि ब्‍याह-शादियों पर पैसे बर्बाद नहीं करने चाहिए। अब अपने बेटे की सगाई का वक्‍त आया तो सिद्धांत ताक पर रख दिए। बस, आप अकेले जाइए और सवा रुपया लेकर सगाई डलवा लाइए।''

''वाह जी, मैं क्‍यों न जाऊँ? आजकल बहनें भी जाती हैं!'' मनोरमा सिर झटककर बोली, ''वीरजी, तुम इस मामले में चुप रहो!''

''सुनो, बेटा, न तुम्‍हारी बात, न मेरी, ''बाबूजी बोले, ''केवल पाँच या सात संबंधी लेकर जाएँगे। कहोगे तो बाजा भी नहीं होगा। वहाँ उनसे कुछ माँगेंगे भी नहीं। जो समधी ठीक समझे दे दें, हम कुछ नहीं बोलेंगे।''

इस पर वीरजी तुनककर कुछ कहने जा ही रहे थे, जब सीढ़ियों पर मंगलसेन के कदमों की आवाज आई।

''अच्‍छा, अभी मंगलसेन से कोई बात नहीं करना। खाना खा लो, फिर बातें होती रहेंगी।'' माँजी ने कहा।

पचास बरस की उम्र के मंगलसेन के बदन के सभी चूल ढीले पड़ गए थे। जब चलता तो उचक-उचककर हिचकोले खाता हुआ और जब सीढ़ियाँ चढ़ता तो पाँव घसीटकर, बार-बार छड़ी ठकोरता हुआ। जब भी वह सड़क पर जा रहा होता, मोड़ पर का साइकिलवाला दुकानदार हमेशा मंगलसेन से मजाक करके कहता, ''आओ, मंगलसेनजी, पेच कस दें!'' और जवाब में मंगलसेन हमेशा उसे छड़ी दिखाकर कहता, ''अपने से बड़ों के साथ मजाक नहीं किया करते। तू अपनी हैसियत तो देख!''

मंगलसेन को अपनी हैसियत पर बड़ा नाज था। किसी जमाने में फौज में रह चुका था, इस कारण अब भी सिर पर खाकी पगड़ी पहनता था। खाकी रंग सरकारी रंग है, पटवारी से लेकर बड़े-बड़े इन्‍सपेक्‍टर तक सभी खाकी पगड़ी पहनते हैं। इस पर ऊँचा खानदान और शहर के धनीमानी भाई के घर में रहना, ऐंठता नहीं तो क्‍या करता?

दहलीज पर पहुँचकर मंगलसेन ने अंदर झाँका। खिचड़ी मूँछें सस्‍ता तंबाकू पीते रहने के कारण पीली हो रही थीं। घनी भौंहों के नीचे दाईं आँख कुछ ज्यादा खुली हुई और बाईं आँख कुछ ज्यादा सिकुड़ी हुई थी। सामने के तीन दाँत गायब थे।

''भौजाईजी, आप रोटियाँ सेंक रही हैं? नौकरों के होते हुए...!''

''आओ मंगलसेनजी, आओ, जरा देखो तो यहाँ कौन बैठा है!''

''नमस्‍ते, चाचाजी!'' वीरजी ने बैठे-बैठे कहा।

''उठकर चाचाजी को पालागन करो, बेटा, तुम्‍हें इतनी भी अक्‍ल नहीं है!'' बाबूजी ने बेटे को झिड़ककर कहा।

वीरजी उठ खड़े हुए और झुककर चाचाजी को पालागन किया। चाचाजी झेंप गए।

कोने में बैठा संतू, जो नल के पास बर्तन मलने लगा था, कंधे के पीछे मुँह छिपाए हँसने लगा।

''जीते रहो, बड़ी उम्र हो!'' मंगलसेन ने कहा और वीरजी के सिर पर इस गंभीरता से हाथ फेरा कि वीरजी के बाल बिखर गए।

मनोरमा खिलखिलाकर हँसने लगी।

''सगाईवाले दिन वीरजी खुद आ गए हैं। वाह-वाह!''

''बैठ जा, बैठ जा मंगलसेन, बहुत बातें नहीं करते।'' बाबूजी बोले।

''आप मेरी जगह पर बैठ जाइए, चाचाजी, मैं दूसरी चटाई ले लूँगा।'' वीरजी ने कहा।

''दो मिनट खड़ा रहेगा तो मंगलसेन की टाँगें नहीं टूट जाएँगी!'' बाबूजी बोले, ''यह खुद भी चटाई पकड़ सकता है। जाओ मंगलसेन, जरा टाँगें हिलाओ और अपने लिए चटाई उठा लाओ।''

माँजी ने दाँत-तले होंठ दबाया और घूर-घूरकर बाबूजी की ओर देखने लगी, ''नौकरों के सामने तो मंगलसेन के साथ इस तरह रुखाई से नहीं बोलना चाहिए। आखिर तो खून का रिश्‍ता है, कुछ लिहाज करना चाहिए।''

मंगलसेन छज्‍जे पर से चटाई उठाने गया। दरवाजे के पास पहुँचकर, नौकर की पीठ के पीछे से गुजरने लगा, तो संतू ने हँसकर कहा, ''वहाँ नहीं है, चाचाजी, मैं देता हूँ, ठहरो। एक ही बर्तन रह गया है, मलकर उठता हूँ।''

संतू निश्चिन्‍त बैठा, कंधों के बीच सिर झुकाए बर्तन मलता रहा।

मनोरमा घुटनों के ऊपर अपनी ठुड्डी रखे, दोनों हाथों से अपने पैरों की उँगलियाँ मलती हुई, कोई वार्ता सुनाने लगी, ''दुकानदारों की टाँगें कितनी छोटी होती हैं, भैया, क्‍या तुमने कभी देखा है?'' अपने भाई की ओर कनखियों से देखकर हँसती हुई बोली, ''जितनी देर वे गद्दी पर बैठे रहें, ठीक लगते हैं, पर जब उठें तो सहसा छोटे हो जाते हैं, इतनी छोटी-छोटी टाँगें! आज मैं एक दुकान पर सूटकेस लेने गई...''

''उठो, संतू, चटाई ला दो। हर वक्त का मजाक अच्‍छा नहीं होता।'' चाचा मंगलसेन संतू से आग्रह करने लगा।

''वहाँ खड़े क्‍या कर रहे हो, मंगलसेन? चलो, इधर आओ! उठ संतू, चटाई ले आ, सुनता नहीं तू? इसे कोई बात कहो तो कान में दबा जाता है!'' माँ बोली।

संतू की पीठ पर चाबुक पड़ी। उसी वक्त उठा और जाकर चटाई ले आया। माँजी ने चूल्‍हे के पास दीवार के साथ रखी दो थालियों में से एक थाली उठाकर मंगलसेन के सामने रख दी। मैले रूमाल से हाथ पोंछते हुए मंगलसेन चटाई पर बैठ गया। थाली में आज तीन भाजियाँ रखी थीं, चपातियाँ खूब गरम-गरम थीं।

सहसा बाबूजी ने मंगलसेन से पूछा, ''आज रामदास के पास गए थे? किराया दिया उसने या नहीं?''

मंगलसेन खुशी में था। उसी तरह चहककर बोला, ''बाबूजी वह अफीमची कभी घर पर मिलता है, कभी नहीं। आज घर पर था ही नहीं।''

''एक थप्‍पड़ मैं तेरे मुँह पर लगाऊँगा, तुमने क्‍या मुझे बच्‍चा समझ रखा है?''

रसोईघर में सहसा सन्‍नाटा छा गया। माँ ने होंठ भींच लिए। मंगलसेन की पुलकन सिहरन में बदल गई। उसका दायाँ गाल हिलने-सा लगा, जैसे चपत पड़ने पर सचमुच हिलने लगता है।

''छह महीने का किराया उस पर चढ़ गया है, तू करता क्‍या रहता है?''

नुक्‍कड़ में बैइे संतू के भी हाथ बर्तनों को मलते-मलते रुक गए। भाई-बहन फर्श की ओर देखने लगे। हाय, बेचारा, मनोरमा ने मन-ही-मन कहा और अपने पैरों की उँगलियों की ओर देखने लगी। वीरजी का खून खौल उठा। चाचाजी गरीब हैं न, इसीलिए इन्‍हें इतना दुत्‍कारा जाता है...

''और पराठा डालूँ, मंगलसेनजी?'' माँ ने पूछा। मंगलसेन का कौर अभी गले में ही अटका हुआ था। दोनों हाथें से थाली को ढँकते हुए हड़बड़ाकर बोला, ''नहीं, भौजाईजी, बस जी!''

''जब मेरे यहाँ रहते यह हाल है, तो जब मैं कभी बाहर जाऊँगा तो क्‍या हाल होगा? मैं चाहता हूँ, तू कुछ सीख जाएगा और किराए का सारा काम सँभाल ले। मगर छह महीने तुझे यहाँ आए हो गए, तूने कुछ नहीं सीखा।''

इस वाक्‍य को सुनकर मंगलसेन के सर्द लहू में थोड़ी-सी हरारत आई।

''मैं आज ही किराया ले आऊँगा, बाबूजी! न देगा तो जाएगा कहाँ? मेरा भी नाम नाम मंगलसेन है!''

''मुझे कभी बाहर जाना पड़ा, तो तुम्‍हीं को काम सँभालना है। नौकर कभी किसी को कमाकर नहीं खिलाते। जमीन-जायदाद का काम करना हो तो सुस्‍ती से काम नहीं चलता। कुछ हिम्‍मत से काम लिया करो।''

मंगलसेन के बदन में झुरझुरी हुई। दिल में ऐसा हुलास उठा कि जी चाहा, पगड़ी उतारकर बाबूजी के कदमों पर रख दे। हुमककर बोला, ''चिंता न करो जी, मेरे होते यहाँ चिड़ी पड़क जाएगा तो कहना? डर किस बात का? मैंने लाम देखी है, बाबूजी! बसरे की लड़ाई में कप्‍तान रस्किन था हमारा। कहने लगा, देखो मंगलसेन, हमारी शराब की बोतल लारी में रह गई है। वह हमें चाहिए। उधर मशीनगन चल रही थी। मैंने कहा, अभी लो, साहब! और अकेले मैं वहाँ से बोतल निकाल लाया। ऐसी क्‍या बात है...''

मंगलसेन फिर चहकने लगा। मनोरमा मुसकराई और कनखियों से अपने भाई की ओर देखकर धीमे-से बोली, ''चाचाजी की दुम फिर हिलने लगी!''

मंगलसेन खाना खा चुका था। उठते हुए हँसकर बोला, ''तो चार बजे चलेंगे न सगाई डलवाने?''

''तू जा, अपना काम देख, जो जरूरत हुई तो तुम्‍हें बुला लेंगे।'' बाबूजी बोले।

चाचा मंगलसेन का दिल धक्-से रह गया। संतू शायद ठीक ही कहता था, मुझे नहीं ले चलेंगे। उसे रुलाई-सी आ गई, मगर फिर चुपचाप उठ खड़ा हुआ। बाहर जाकर जूते पहले, छड़ी उठाई और झूलता हुआ सीढ़ियों की ओर जाने लगा।

वीरजी का चेहरा क्रोध और लज्‍जा से तमतमा उठा। मनोरमा को डर लगा कि बात और बिगड़ेगी, वीरजी कहीं बाबूजी से न उलझ बैठें। माँजी को भी बुरा लगा। धीमे-से कहने लगीं, देखों जी, नौकरों के सामने मंगलसेन की इज्‍जत-आबरू का कुछ तो खयाल रखा करे। आखिर तो खून का रिश्‍ता है। कुछ तो मुँह-‍मुलाहिजा रखना चाहिए। दिन-भर आपका काम करता है।''

''मैंने उसे क्‍या कहा है?'' बाबूजी ने हैरान होकर पूछा।

''यों रुखाई के साथ नहीं बोलते। वह क्‍या सोचता होगा? इस तरह बेआबरूई किसी की नहीं करनी चाहिए।''

''क्‍या बक रही हो? मैंने उसे क्‍या कहा है?'' बाबूजी बोले। फिर सहसा वीरजी की ओर घूमकर कहने लगे, ''अब तू बोल, भाई, क्‍या कहता है? कोई भी काम ढंग से करने देगा या नहीं?''

''मैंने कह दिया, पिताजी, आप अकेले जाइए और सवा रुपया लेकर सगाई डलवा लाइए।''

रसोईघर में चुप्‍पी छा गई। इस समस्‍या का कोई हल नजर नहीं आ रहा था। वीरजी टस-से-मस नहीं हो रहे थे।

सहसा बाबूजी ने सिर पर से पगड़ी उतारी और सिर आगे को झुकाकर बोले, ''कुछ तो इन सफेद बालों का खयाल कर! क्‍यों हमें रुसवा करता है?''

वीरजी गुस्से में थे। चाचा मंगलसेन गरीब हैं, इसीलिए उसके साथ ऐसा बुरा व्‍यवहार किया जाता है। यह बात उसे खल रही थी। मगर जब बाबूजी ने पगड़ी उतारकर अपने सफेद बालों की दुहाई दी तो सहम गया। फिर भी साहस करके बोला, ''यदि आप अकेले नहीं जाना चाहते तो चाचाजी को साथ ले जाइए। बस दो जने चले जाएँ।''

''कौन-से चाचा को?'' माँजी ने पूछा।

''चाचा मंगलसेन को।''

कोने में बैठे संतू ने भी हैरान होकर सिर उठाया। माँ झट-से बोली, ''हाय-हाय बेटा, शुभ-शुभ बोलो! अपने रईस भाइयों को छोड़कर इस मरदूद को साथ ले जाएँ? सारा शहर थू-थू करेगा!''

''माँजी, अभी तो आप कह रही थीं, खून का रिश्‍ता है। किधर गया खून का रिश्‍ता? चाचाजी गरीब हैं, इसीलिए?''

''मैं कब कहती हूँ, यह न जाए! लेकिन और संबंधी भी तो जाएँ। अपने धनी-मानी संबंधियों को छोड़ दें और इस बहु‍रूपिए को साथ ले जाएँ, क्‍या यह अच्‍छा लगेगा?''

''तो फिर बाबूजी अकेले जाएँ,'' वीरजी परेशान हो उठे, ''मैंने जो कहना था कह दिया! अब जो तुम्‍हारे मन में आए करो, मेरा इससे कोई वास्‍ता नहीं।'' और उठकर रसोईघर से बाहर चले गए।

बेटे के यों उठ जाने से रसोईघर में चुप्‍पी छा गई। माँ और बाप दोनों का मन खिन्‍न हो उठा। ऐसा शुभ दिन हो, बेटा घर पर आए और यों तकरार होने लगे। माँ का दिल टूक-टूक होने लगा। उधर बाबूजी का क्रोध बढ़ रहा था। उनका जी चाहता था कह दें, जा फिर मैं भी नहीं जाऊँगा। भेज दे जिसको भेजना चाहता है। मगर यह वक्‍त झगड़े को लंबा करने का न था।

सबसे पहले माँ ने हार मानी, ''क्‍या बुरा कहता है! आजकल लड़के माँ-बाप के हजारों रुपये लुटा देते हैं। इसके विचार तो कितने ऊँचे हैं! यह तो सवा रुपये में सगाई करना चाहता है। तम मंगलसेन को ही अपने साथ ले जाओ। अकेले जाने से तो अच्‍छा है।''

बाबूजी बड़बड़ाए, बहुत बोले, मगर आखिर चुप हो गए। बच्‍चों के आगे किस माँ-बाप की चलती है? और चुपचाप उठकर अपने कमरे में जाने लगे।

''जा संतू, मंगलसेन को कह, तैयार हो जाए।'' माँजी ने कहा।

मनोरमा चहक उठी और भागी हुई वीरजी को बताने चली गई कि बाबूजी मान गए हैं।

मंगलसेन को जब मालूम हुआ कि अकेला वही बाबूजी के साथ जाएगा, तो कितनी ही देर तक वह कोठरी में उचकता और चक्‍कर लगाता रहा। बदन का छटाँक-भर खून फिर उछलने लगा। जी चाहा कि संतू से उसी वक्‍त शर्त के दो रुपये रखवा ले। क्‍यों न हो, आखिर मुझसे बड़ा संबंधी है भी कौन, मुझे नहीं ले जाएँगे तो किसे ले जाएँगे? मैं और बाबूजी ही इस घर के कर्त्ता-धर्त्ता हैं और कौन है? जितना ही अधिक वह इस बात पर सोचता, उतना ही अधिक उसे अपने बड़प्‍पन पर विश्‍वास होने लगता। आखिर उसने कोने में रखी ट्रंकी को खेला और कपड़े बदलने लगा।

घंटा-भर बाद जब मंगलसेन तैयार होकर आँगन में आया, तो माँजी का दिल बैठ गया - यह सूरत लेकर समधियों के घर जाएगा? मंगलसेन के सिर पर खाकी पगड़ी, नीचे मैली कमीज के ऊपर खाकी फौजी कोट, जिसके धागे निकल रहे थे और नीचे धारीदार पाजामा और मोटे-मोटे काले बूट। माँ को रुलाई आ गई। पर यह अवसर रोने का नहीं था। अपनी रुलाई को दबाती हुई वह आगे बढ़ आई।

''मनोरमा, जा भाई की आलमारी में से एक धुला पाजामा निकाल ला।'' फिर बाबूजी के कमरे की ओर मुँह करके बोली, ''सुनते हो जी, अपनी एक पगड़ी इधर भेज देना। मंगलसेन के पास ढंग की पगड़ी नहीं है।''

मंगलसेन का कायाकल्‍प होने लगा। मनोरमा पाजामा ले आई। संतू बूट पालिश करने लगा। आँगन के ऐन बीचोंबीच एक कुरसी पर मंगलसेन को बिठा दिया गया और परिवार के लोग उसके आसपास भाग-दौड़ करने लगे। कहीं से मनोरमा की दो सहेलियाँ भी आ पहुँची थीं। मंगलसेन पहले से भी छोटा लग रहा था। नंगा सिर, दोनों हाथ घुटनों के बीच जोड़े वह आगे की ओर झुककर बैठा था। बार-बार उसे रोमांच हो रहा था।

मंगलसेन का स्‍वप्‍न सचमुच साकार हो उठा। समधियों के घर में उसकी वह आवभगत हुई कि देखते बनता था। मंगलसेन आरामकुरसी पर बैठा था और पीछे एक आदमी खड़ा पंखा झल रहा था। समधी आगे-पीछे, हाथ बाँधे घूम रहे थे। एक आदमी ने सचमुच झुककर बड़े आग्रह से कहा, ''और दूध लाऊँ, चाचाजी? थोड़ा-सा और?''

और जवाब में मंगलसेन ने कहा, ''हाँ, आधा गिलास ले आओ।''

समधियों के घर की ऐसी सज-धज थी कि मंगलसेन दंग रह गया और उसका सिर हवा में तैरने लगा। आवाज ऊँची करके बोला, ''लड़की कुछ पढ़ी-लिखी भी है या नहीं? हमारा बेटा तो एम.ए. पास है।''

''जी, आपकी दया से लड़की ने इसी साल बी.ए. पास किया है।''

मंगलसेन ने छड़ी से फर्श को ठकोरा , फिर सिर हिलाकर बोला, ''घर का काम-धंधा भी कुछ जानती है या सारा वक्‍त किताबें ही पढ़ती रहती है?''

''जी, थोड़ा-बहुत जानती है।''

''थोड़ा-बहुत क्‍यों?''

आखिर सगाई डलवाने का वक्त आया। समधी बादामों से भरे कितने ही थाल लाकर बाबूजी और मंगलसेन के सामने रखने लगे। बाबूजी ने हाथ बाँध दिए, ''मैं तो केवल एक रुपया और चार आने लूँगा। मेरा इन चीजों में विश्‍वास नहीं है। हमें अब पुरानी रस्‍मों को बदलना चाहिए। आप सलामत रहें, आपका सवा रुपया भी मेरे लिए सवा लाख के बराबर है।''

''आपको किस चीज की कमी है, लालाजी! पर हमारा दिल रखने के लिए ही कुछ स्‍वीकार कर लीजिए।''

बाबूजी मुसकराए, ''नहीं महराज, आप मुझे मजबूर न करें। यह उसूल की बात है। मैं तो सवा ही रुपया लेकर जाऊँगा। आपका सितारा बुलंद रहे! आपकी बेटी हमारे घर आएगी, तो साक्षात लक्ष्‍मी विराजेगी!''

मंगलसेन के लिए चुप रहना असंभव हो रहा था। हुमककर बोला, ''एक बार कह जो दिया जी कि हम सवा रुपया ही लेंगे। आप बार-बार तंग क्‍यों करते हैं?''

बेटी के पिता हँस दिए और पास खड़े अपने किसी संबंधी के कान में बोले, ''लड़के के चाचा हैं, दूर के। घर में टिके हुए हैं। लालाजी ने आसरा दे रखा है।''

आखिर समधी अंदर से एक थाल ले आए, जिस पर लाल रंग का रेशमी रूमाल बिछा था और बाबूजी के सामने रख दिया। बाबूजी ने रूमाल उठाया, तो नीचे चाँदी के थाल में चाँदी की तीन चमचम करती कटोरियाँ रखी थीं, एक में केसर, दूसरी में रांगला धागा, तीसरी में एक चमकता चाँदी का रुपया और चमकती चवन्‍नी। इसके अलावा तीन कटोरियों में तीन छोटे-छोटे चाँदी के चम्‍मच रखे थे।

''आपने आखिर अपनी ही बात की,'' बाबूजी ने हँसकर कहा, ''मैं तो केवल सवा रुपया लेने आया था...'' मगर थाल स्‍वीकार कर लिया और मन-ही-मन कटोरियों, थाल और चम्‍मचों का मूल्‍य आँकने लगे।

मनोरमा और उसकी सहेलियाँ छज्‍जे पर खड़ी थीं जब दोनों भाई सड़क पर आते दिखाई दिए। मंगलसेन के कंधे पर थाल था, लाल रंग के रूमाल से ढँका हुआ और आगे-आगे बाबूजी चले आ रहे थे।

वीरजी अब भी अपने कमरे में थे और पलंग पर लेटे किसी नावल के पन्‍नों में अपने मन को लगाने का विफल प्रयास कर रहे थे। उनका माथा थका हुआ था, मगर हृदय धूमिल भावनाओं से उद्वेलित होने लगा था। क्‍या प्रभा मेरे लिए भी कोई संदेश भेजेगी? सवा रुपये में सगाई डलवाने के बारे में वह क्‍या सोचती होगी? मन-ही-मन तो जरूर मेरे आदर्शों को सराहती होगी। मैंने एक गरीब आदमी को अपनी सगाई डलवाने के लिए भेजा। इससे अधिक प्रत्‍यक्ष प्रमाण मेरे आदर्शों का क्‍या हो सकता है?

''लाख-लाख बधाइयाँ, भौजाईजी!'' घर में कदम रखते ही मंगलसेन ने आवाज लगाई।

मनोरमा और उसकी सहेलियाँ भागती हुई जँगले पर आ गईं। बाबूजी गंभीर मुद्रा बनाये, आँगन में आए और छड़ी कोने में रखकर अपने कमरे में चले गए।

मनोरमा भागती हुई नीचे गई और झपटकर थाल चाचा मंगलसेन के हाथ से छीन लिया।

''कैसी पगली है! दो मिनट इंतजार नहीं कर सकती।''

''वाह जी, वाह!'' मनोरमा ने हँसकर कहा, ''बाबूजी की पगड़ी पहन ली तो बाबूजी ही बन बैठे हैं! लाइए, मुझे दीजिए। आपका काम पूरा हो गया।''

माँजी की दोनों ब‍हनें जो इस बीच आ गई थीं, माँजी से गले मिल-मिलकर बधाई देने लगीं। आवाज सुनकर वीरजी भी जँगले पर आ खड़े हुए और नीचे आँगन का दृश्‍य देखने लगे। थाल पर रखे लाल रूमाल को देखते ही उनका रोम-रोम पुलकित हो उठा। सहसा ही वह ससुराल की चीजों से गहरा लगाव महसूस करने लगे। इस रूमाल को जरूर प्रभा ने अपने हाथ से छुआ होगा। उनका जी चाहा कि रूमाल को हाथ में लेकर चूम लें। इस भेंट को देखकर उनका मन प्रभा से मिलने के लिए बेताब होने लगा।

माँजी ने थाल पर से रूमाल उठाया। चमकती कटोरियाँ, चमकता थाल बीच में रखे चम्‍मच। वीरजी को महसूस हुआ, जैसे प्रभा ने अपने गोरे-गोरे हाथों से इन चीजों को करीने से सजाकर रखा होगा।

''पानी पिलाओ, संतू, ''चाचा मंगलसेन ने आँगन में कुर्सी पर बैठते हुए, टाँग के ऊपर टाँग रखकर, संतू को आवाज लगाई।

इतने में माँजी को याद आई, ''तीन कटोरियाँ और दो चम्‍ममच? यह क्‍या हिसाब हुआ? क्‍या तीन चम्‍मच नहीं दिए समधियों ने।'' फिर बाबूजी के कमरे की ओर मुँह करके बोलीं, ''अजी सुनते हो! तुम भी कैसे हो, आज के दिन भी कोई अंदर जा बैठता है?''

''क्‍या है?'' बाबूजी ने अंदर से ही पूछा।




'कुछ बताओ तो सही, समधियों ने क्‍या कुछ दिया है?''

''बस, थाल में जो कुछ है वही दिया है, तेरे बेटे ने मना जो कर दिया था।''

''क्‍या तीन कटोरियाँ थीं और दो चम्‍मच थे?''

''नहीं तो, चम्‍मच भी तीन थे।''

''चम्‍मच तो यहाँ सिर्फ दो रखे हैं।''

''नहीं-नहीं, ध्‍यान से देखों, जरूर तीन होंगे। मंगलसेन से पूछो, वही थाल उठाकर लाया था।''

''मंगलसेनजी, तीसरा चम्‍मच कहाँ है?''

मंगलसेन संतू को सगाई का ब्‍यौरा दे रहा था - समधी हमारे सामने हाथ बाँधे यों खड़े थे, जैसे नौकर हों। लड़की बड़ी सुशील है, बड़ी सलीकेवाली है, बी.ए. पास है, सीना-पिरोना भी जानती है...

''मंगलसेनजी, तीसरा चम्‍मच कहाँ है?''

''कौन-सा चम्‍मच? वहीं थाल में होगा।'' मंगलसेन ने लापरवाही से जवाब दिया।

''थाल में तो नहीं है।''

''तो उन्‍होंने दो ही चम्‍मच दिए होंगे। बाबूजी ने थाल लिया था।''

''हमें बेवकूफ बना रहे हो, मंगलसेनजी, तुम्‍हारे भाई कह रहे हैं तीन चम्‍मच थे!''

इतने में बाबूजी की गरज सुनाई दी, ''इसीलिए मेरे साथ गए थे कि चम्‍मच गवाँ आओगे? कुछ नहीं तो पाँच-पाँच रुपये का एक-एक चम्‍मच होगा।''

मंगलसेन ने उसी लापरवाही से कुरसी पर से उठकर कहा, ''मैं अभी जाकर पूछ आता हूँ, इसमें क्‍या है? हो सकता है, उन्‍होंने दो ही चम्‍मच रखे हों।''

''वहाँ कहाँ जाओगे? बताओ चम्‍मच कहाँ है? सारा वक्त तो थाल पर रूमाल रखा रहा।''

''बाबूजी, थाल तो आपने लिया था, आपने चम्‍मच गिने नहीं थे?''

''मेरे साथ चालाकी करता है? बदजात! बता तीसरा चम्‍मच कहाँ है?''

माँजी चम्‍मच खो जाने पर विचलित हो उठी थीं। बहनों की ओर घूमकर बोलीं, ''गिनी-चुनी तो समधियों ने चीजें दी हैं, उनमें से भी अगर कुछ खो जाए, तो बुरा तो आखिर लगता ही है!''

''कैसा ढीठ आदमी है, सुन रहा है और कुछ बोलता नहीं!'' बाबूजी ने गरजकर कहा।

चम्‍मच खो जाने पर अचानक वीरजी को बेहद गुस्‍सा आ गया। प्रभा ने चम्‍मच भेजा और वह उन तक पहुँच ही नहीं। प्रभा के प्रेम की पहली निशानी ही खो गई। वीरजी सहसा आवेश में आ गए। वीरजी ने आव देखा न ताव, मंगलसेन के पास जाकर उसे दोनों कंधों से पकड़कर झिंझोड़ दिया।

''आपको इसीलिए भेजा था कि आप चीजें गँवा आएँ?''

सभी चुप हो गए। सकता-सा छा गया। वीरजी खिन्‍न-से महसूस करने लगे कि मुझसे यह क्‍या भूल हो गई और झेंपकर वापस जाने लगे। ''तुम बीच में मत पड़ो, बेटा! अगर चम्‍मच खो गया है तो तुम्‍हारी बला से! सबका धर्म अपने-अपने साथ है। एक चम्‍मच से कोई अमीर नहीं बन जाएगा!''

''जेब तो देखो इसकी।'' बाबूजी ने गरजकर कहा।

मौसियाँ झेंप गईं और पीछे हट गईं। पर मनोरमा से न रहा गया। झट आगे बढ़कर वह जेब देखने लगी। रसोईघर की दहलीज पर संतू हाथ में पानी का गिलास उठाए रुक गया और मंगलसेन की ओर देखने लगा। चाचा मंगलसेन खड़ा कभी एक का मुँह देख रहा था, कभी दूसरे का। वह कुछ कहना चाहता था, मगर मुँह से एक शब्‍द भी नहीं निकल रहा था।

एक जेब में से मैला-सा रूमाल निकला, फिर बीड़ियों की गड्डी, माचिस, छोटा-सा पैन्सिल का टुकड़ा।

''इस जेब में तो नहीं है।'' मनोरमा बोली और दूसरी जेब देखने लगी। मनोरमा एक-एक चीज निकालती और अपनी सहेलियों को दिखा-दिखाकर हँसती।

दाईं जेब में कुछ खनका। मनोरमा चिल्‍ला उठी, ''कुछ खनका है, इसी जेब में है, चोर पकड़ा गया! तुमने सुना, मालती?''

जेब में टूटा हुआ चाकू रखा था, जो चाबियों के गुच्‍छे से लगकर खनका था।

''छोड़ दो, मनोरमा! जाने दो, सबका धर्म अपने-अपने साथ है। आपसे चम्‍मच अच्‍छा नहीं है, मंगलसेनजी, लेकिन यह सगाई की चीज थी।''

मंगलसेन की साँस फूलने लगी और टाँगें काँपने लगीं, लेकिन मुँह से एक शब्‍द भी नहीं निकल पा रहा था।

''दोनों कान खोलकर सुन ले, मंगलसेन!'' बाबूजी ने गरजकर कहा, ''मैं तेरे से पाँच रुपये चम्‍मच के ले लूँगा, इसमें मैं कोई लिहाज नहीं करूँगा।''

मंगलसेन खड़े-खड़े गिर पड़ा।

''बधाई, बहनजी!'' नीचे आँगन में से तीन-चार स्त्रियों की आवाज एक साथ आ गई।

मंगलसेन गिरा भी अजीब ढंग से। धम्‍म-से जमीन पर जो पड़ा तो उकड़ूँ हो गया, और पगड़ी उतरकर गले में आ गई। मनोरमा अपनी हँसी रोके न रोक सकी।

''देखो जी, कुछ तो खयाल करो। गली-मुहल्‍ला सुनता होगा। इतनी रुखाई से भी कोई बोलता है!'' माँजी ने कहा, फिर घबराकर संतू से कहने लगीं, ''इधर आओ संतू, और इन्‍हें छज्‍जे पर लिटा आओ।''

वीरजी फिर खिन्‍न-सा अनुभव करते हुए अपने कमरे में चले गए। मैंने जल्‍दबाजी की, मुझे बीच में नहीं पड़ना चाहिए था। इन्‍होंने चम्‍मच कहाँ चुराया होगा, जरूर कहीं गिर गया होगा।

बाबूजी नीचे अपने कमरे में चले गए। शीघ्र ही घर में ढोलक बजने की आवाज आने लगी। मनोरमा और उसकी सहेलियाँ आँगन में कालीन बिछवाकर बैठ गईं। ढोलक की आवाज सुनकर पड़ोसिनें घर में बधाई देने आने लगी।

ऐन उसी वक्त गलीवाले दरवाजे के पास एक लड़का आ खड़ा हुआ। संकोचवश वह निश्‍चय नहीं कर पा रहा था कि अंदर जाएगा या वहीं खड़ा रहे। मनोरमा ने देखते ही पहचान लिया कि प्रभा का भाई, वीरजी का साला है। भागी हुई उसके पास जा पहुँची और शरारत से उसके सिर पर हाथ फेरने लगी।

''आओ, बेटाजी, अंदर आओ, तुम यहाँ पड़ोस में रहते हो न?''

''नहीं, मैं प्रभा का भाई हूँ।''

''मिठाई खाओगे?'' मनोरमा ने फिर शरारत से कहा और हँसने लगी। लड़का सकुचा गया।

''नहीं, मैं तो यह देने आया हूँ,'' उसने कहा और जाकेट की जेब में से एक चमकता, सफेद चम्‍मच निकाला और मनोरमा के हाथ में देकर उन्‍हीं कदमों वापस लौट गया।

''हाय, चम्‍मच मिल गया! माँजी चम्‍मच मिल गया!''

पर माँजी संबंधियों से घिरी खड़ी थीं। मनोरमा रुक गई और माँ से नजरें मिलाने की कोशिश करते हुए, हाथ ऊँचा करके चम्‍मच हिलाने लगी। चम्‍मच को कभी नाक पर रखती, कभी हवा में हिलाती, कभी ऊँचा फेंककर हाथ में पकड़ती, मगर माँजी कुछ समझ ही नहीं रही थीं...

छज्‍जे पर संतू ने मंगलसेन को खाट पर लिटाया और मुँह पर पानी का छींटा देते हुए बोला, ''तुम शर्त जीत गए। बस तनख्‍वाह मिलने पर दो रुपये नकद तुम्‍हारी हथेली पर रख दूँगा।''







रबिन्द्रनाथ टैगोर


रबिन्द्रनाथ टैगोर एक ऐसे व्यक्त्तिव थे जिन्हें शायद ही कभी कोई भूल सकता हो और न ही भुलाए जा सकते है | ये अकेले ऐसे व्यक्ति थे जिनकी लिखी रचनाएँ  दो देशों का राष्ट्रगान है | कवि, चित्रकार, संगीतकार, साहित्यकार, दार्शनिक आदि रूप में हमे इनकी पहचान मिलती है | ऐसे प्रतिभासंपन्न व्यक्त्तिव को कूड़ा-करकट टीम की ओर से इनकी पुण्यतिथि पर नमन ||








Sunday, 30 July 2017

ऐसे हैं कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद जिन्हें लोग आज भी याद करते हैं



आज है 31 जुलाई यानी की धनपतराय उर्फ़ प्रेमचन्द जी का जन्मदिवस, कूड़ा-करकट टीम की ओर से इनकी लेखनी को सलाम और जन्मदिन की बधाई | फोटो एडिट आमिर 'विद्यार्थी' द्वारा |   






मुंशी जी आप विधाता तो न थे, लेखक थे 

अपने किरदारों की किस्मत तो लिख सकते थे |  _गुलज़ार


धनपतराय जिन्हें हम 'प्रेमचन्द' के नाम से जानते है और 'प्रेमचन्द' जिन्हें हम उनकी रचनाओं एवं उनके द्वारा दिए गये साहित्यिक योगदान से जानते है | प्रेमचन्द एक ऐसा नाम है जिन्हें मात्र हिंदी में ही नहीं देश की अन्य भाषाओँ में भी पढ़ा और जाना जाता है | कथा सरताज प्रेमचन्द का साहित्य जितना अपने समय में प्रासंगिक था उससे कही अधिक आज लगता है | प्रेमचन्द पूर्व साहित्य में स्वप्नलोक की अभिव्यक्ति अधिक मिलती है, प्रेमचन्द के आने से कथा साहित्य को भाव और शिल्प दोनों ही पक्षों को एक नई दिशा और गति मिली | जिसका प्रभाव एक लम्बे समय तक दिखाई देता है | इनकी रचनाओं में हर उस उपेक्षित वर्ग को आवाज मिली है जिसको कमजोर समझा जाता रहा है, जो अपने हक से वंचित रहें है इनमें किसान, श्रमिक, दलित, स्त्री,वेश्या और हर वो सामान्य व्यक्ति जो अपने अधिकारों के लिए छटपटा रहा था | या यूँ कहे की सामाजिक समस्याओं को प्रेमचन्द के रचनाकर्म से प्रखर अभिव्यक्ति मिली है | इनकी कहानियों व उपन्यासों के पात्र व्यवस्थाओं से संघर्ष करते साफ़ नजर आते हैं और वे पात्र रुकते नहीं है बदलाव की उम्मीद रखते है "पत्नी से पति" नामक कहानी में गोदावरी अपने पति से कहती है "सब सोच लिया है | मैं चल कर दिखा दूंगी | हाँ, मैं जो कुछ कहूँ, वह तुम किये जाना | अब तक मैं तुम्हारे इशारे पर चलती थी, अब से तुम मेरे इशारे पर चलना |..........आज तक तुम मेरे पति थे आज से मैं तुम्हारा पति हूँ | इस तरह यहाँ एक परिवर्तन की घोषणा दिखाई देती है और यही इनके साहित्य की विशेषता भी है | कभी-कभी हमे प्रेमचन्द को बिना किसी प्रभाव और वाद के भी देखना चाहिए भले ही प्रेमचन्द पर इनका प्रभाव रहा हो | क्योंकि अधिकतर विद्वान या बुद्धिजीवि उन पर गांधी, तोल्स्तोय, व मार्क्स आदि प्रभाव को सिद्ध करने में ही लगे रहते है जिससे उनके समग्र साहित्य से हम यथार्थ रूप से परिचित नहीं हो पाते है | 
प्रेमचन्द ने वैसे तो 300 के आस-पास कहानियाँ लिखी जिसमें ईदगाह, कफ़न, मन्त्र, नमक का दरोगा, बड़े घर की बेटी, बूढी काकी, ठाकुर का कुआँ, नशा, जेल, शराब की दूकान आदि कहानियां लिखी जो आज भी अपने विषयानुरूप प्रासंगिक ठहरती है | 
प्रेमचन्द सेवासदन से गोदान तक भले ही अलग-अलग रूप में नज़र आते हों परन्तु उनका उद्देश्य एक ही था, समाज में व्याप्त कुरीतियों, हिन्दू-मुस्लिम एकता, छुआछूत, स्त्रियों की दशा, आदि को यथार्थ रूप में उजागर करना |  
'साहित्य का उद्देश्य' में प्रेमचन्द लिखते है - 'वह (साहित्य) देशभक्ति और राजनीति के पीछे चलने वाली सच्चाई भी नहीं है, बल्कि उसके आगे मशाल दिखाती हुई सच्चाई है |' प्रेमचन्द एक ऐसे समाज का सपना देखते थे जिसमें सब बराबर का हक रखते हों, बस यही वजह है की प्रेमचन्द को हर कोई अपने अनुसार व्याख्यायित करता है और अपने से जोड़ता है | 


                                                         __वसीम

Monday, 17 July 2017

जन्मदिवस - नेल्सन मंडेला, राजेश जोशी, मेहदी हसन


आज है 18 जुलाई यानी अपने-अपने क्षेत्र के तीन महारथियों का जन्मदिन, जिनमें रंगभेद नीति के विरोध के प्रतीक नेल्सन मंडेला, ग़ज़ल के शहंशाह मेहदी हसन जिनकी गायकी को आज भी लोग बहुत पसंद करते हैं और राजेश जोशी जिन्होंने 'मारे जाएँगे', 'बच्चे काम पर जा रहें है', 'समरगाथा' आदि जैसी व्यंग्यात्मक कविताएँ लिखी | कूड़ा-करकट टीम की ओर से इन तीनों को नमन | फोटो एडिट आमिर 'विद्यार्थी' द्वारा |     


(((((((((( नेल्सन मंडेला )))))))))



मंडेला

वाह! वह भी क्या इंसान हुआ!
नहीं स्वीकार था उसे
अपने अंदर के इंसान को
समर्पण करने देना
घोर अमानवीय कृत्य के भी आगे।
किसने उससे क्या लिया क्या छिना
इससे कोई फर्क नहीं पड़ा
वो या उसका व्यक्तित्व
न इससे कभी छोटा पड़ा।

भयानक दासता और दमन से जन्मा
अपने अंदर सम्मान और आजादी की
निरंतर चाह लिए हुए
जीता रहा देखने को अंत
उस दानवी शासन का
पर ह्रदय मे कभी नही थी
कोई कड़वाहट या घृणा
जीवन था उसका उत्सव
हंसी, खुशी और आजादी का।

बहुत नहीं है
अभी तक पैदा हुए इस धरती पर
उस जैसा युग-पुरुष
आशा है उसका जीवन
अपनी प्रेरणा से पैदा कर सकेगा
उस जैसे ही अनेक महापुरुष
जिसकी जरूरत है
भविष्य को।
वाह! वह भी क्या इंसान हुआ!

___प्रेम व प्रसाद 
ईशा ब्लॉग से साभार 






"मैं जातिवाद से बहुत नफरत करता हूँ, मुझे यह बर्बरता लगती है. फिर चाहे वह अश्वेत व्यक्ति से आ रही हो या श्वेत व्यक्ति से |"
 


 "लोगों को उनके मानव अधिकारों से वंचित रखना, उनकी असल मानवता को चुनौती देना है |"
 

                                    __नेल्सन मंडेला




(((((((( राजेश जोशी ))))))))






मारे जाएँगे 


जो इस पागलपन में शामिल नहीं होंगे, मारे जाएँगे

कठघरे में खड़े कर दिये जाएँगे
जो विरोध में बोलेंगे
जो सच-सच बोलेंगे, मारे जाएँगे

बर्दाश्‍त नहीं किया जाएगा कि किसी की कमीज हो
उनकी कमीज से ज्‍यादा सफ़ेद
कमीज पर जिनके दाग नहीं होंगे, मारे जाएँगे

धकेल दिये जाएंगे कला की दुनिया से बाहर
जो चारण नहीं होंगे
जो गुण नहीं गाएंगे, मारे जाएँगे

धर्म की ध्‍वजा उठाने जो नहीं जाएँगे जुलूस में
गोलियां भून डालेंगी उन्हें, काफिर करार दिये जाएँगे

सबसे बड़ा अपराध है इस समय निहत्थे और निरपराधी होना
जो अपराधी नहीं होंगे, मारे जाएँगे | 



(((((((( मेहदी हसन ))))))))






कुछ ग़ज़लें आज याद आ रहीं हैं जिन्हें हमने अनगिनत बार सुना है और सुनते रहते हैं |  शहंशाह-ए-ग़ज़ल को आज याद करते हैं उन्हीं के द्वारा गायी हुई ग़ज़लों से | 


  1. रंजिश ही सही
  2. चरागे तूर जलाओ बड़ा अँधेरा है
  3. प्यार भरे दो शर्मीले नैन
  4. दिल ए नादान तुझे हुआ क्या है
  5. वो दिल नवाज़ है
  6. आज वो मुस्कुरा दिया
  7. जब आती है तेरी याद
  8. मैं नज़र से पी रहा हूँ
  9. ये मोजिज़ा भी मुहब्बत कभी
  10. दिल की बात लबों पे लाकर
  11. दुनिया किसी के प्यार में जन्नत से कम नहीं
  12. दायम पड़ा हुआ हूँ
  13. मुब्हम बात पहेली जैसी
  14. एक बस तू ही नहीं मुझसे खफा हो बैठा
  15. एक सितम और मेरी जाँ अभी जाँ बाकी है
  16. शोला था जल बुझा हूँ
  17. ज़िन्दगी में तो सभी प्यार किया करते हैं
  18. उसने जब मेरी तरफ प्यार से देखा होगा
  19. किया है प्यार जिसे हमने ज़िन्दगी की तरह
  20. मैं ख्याल हूँ किसी और का
  21. राजस्थानी लोक गीत पधारो म्हारे देश
  22. जब उस ज़ुल्फ़ की बात चली
  23. तूने ये फूल जो जुल्फों में लगा रखा है
  24. गुलों में रंग भरे बादे नौ बहार चले
  25. आये कुछ अब्र कुछ शराब आये
  26. पत्ता पत्ता बूटा बूटा हाल हमारा जाने है
  27. तुम्हारे साथ भी तनहा हूँ
  28. मुहब्बत करने वाले
  29. रफ्ता रफ्ता
  30. भूली बिसरी चंद उम्मीदें
  31. अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिले
  32. मुझे तुम नज़र से गिरा तो रहे हो
  33. हर दर्द को ए जाँ मैं सीने में सामा लूं
  34. रोशन जमाल ए यार से हैं
  35. भूली बिसरी चाँद उम्मीदें
  36. गुंचा ए शौक लगा है 

Saturday, 8 July 2017

हिंदी सिनेमा का गुरु और कुमार


आज है 9 जुलाई यानी हिंदी सिनेमा जगत की ऐसी दो महान,बहुआयामी व्यक्तित्व से ओत-प्रोत प्रतिभाओं का जन्मदिवस। जिन्हें सामान्यत: हम सभी प्यासा, कागज़ के फ़ूल,आर-पार,साहब बीवी और गुलाम,चौदहवीं का चाँद तथा दस्तक,कोशिश,सीता और गीता,शोले,आंधी,अर्जुन पंडित इत्यादि फिल्मों के माध्यम से जानते हैं क्रमश:उनके नाम हैं वसंथ कुमार शिवशंकर पादुकोण अर्थात 'गुरु दत्त' तथा हरिभाई जरीवाल अर्थात शोले फिल्म में ठाकुर का किरदार निभाने वाले संजीव कुमार। तो आइए कूड़ा-करकट ब्लॉग समूह की ओर से शुरू की गई साहित्यकारों-फिल्मकारों के जन्मदिवस और पुण्यतिथि की इस बहुमूल्य कड़ी में देखते हैं कुछ चित्र जिनको संवारा है 'आमिर विद्यार्थी' ने।



























                                                        photo edit by:-आमिर विद्यार्थी

Friday, 7 July 2017

पहला गिरमिटिया के लेखक का जन्मदिवस

आज है 8 जुलाई यानी साहित्य अकादेमी,पद्मश्री,व्यास तथा भारतेंदु आदि पुरस्कार से समादृत उपन्यासकार,कहानीकार,नाटककार और आलोचक श्रीयुत "गिरिराज किशोर" का जन्मदिवस। तो आइए कूड़ा-करकट ब्लॉग समूह की ओर से जन्मदिवस तथा पुण्यतिथि मनाने की इस कड़ी में देखते हैं कुछ चित्र जिनको संवारा है हमारी ही टीम के सदस्य आमिर विद्यार्थी ने।













हरिशंकर परसाई

आज है 22 अगस्त यानि की हरिशंकर परसाई जी का जन्मदिन | परसाई जी ने मात्र व्यंग्य को विधा के रूप में ही पहचान नहीं दिलाई बल्कि असल में एक सम्...